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एक महत्वपूर्ण आलेख दिनांक 10.10.2012 को दैनिक
हिंदुस्तान में प्रतीक्षा
शर्मा द्वारा
लिखा गया। हिंदुस्तान के मानसिक स्वस्थ्य जगत के लिए महत्वपूर्ण है। मैं उसे
प्रस्तुत कर रहा हूँ। ..........................
मानसिक
स्वास्थ्य विधेयक के
मनोविकार
केंद्रीय
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का प्रस्तावित मानसिक विधेयक 2012 मानसिक
बीमारियों की वजह से अक्षमता के साथ जी रहे लोगो के लिए एक सदमा है। हालाँकि इस
विधेयक की वकालत करने वाले इसे मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बताते हुए अपनी
पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन यह विधेयक मनोचिकितसकों की शक्ति में वृद्धि कर
सकता है की इसके सहारे वे मनोरोगियों ( उनकी बीमारी की पुष्टि हो या
नहीं) के साथ कुछ भी कर पा सकेंगे।
मनोविकारों
के साथ जीने वाले लम्बे समय से अपने आधारभूत अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। इन
अधिकारों में जीने के अधिकार के साथ प्रतिष्ठा, आजादी, निजता, इलाज करने या न करने की
स्वतंत्रता आदि शामिल है। मनोरोगियों को दुनिया के सभी देशों के कानून के
तहत खतरनाक और विक्षिप्त करार दिया जाता है। इन्हें आम आदमी के अधिकार दिए
जाते। इन्हें
वोट के अधिकर
से भी वंचित कर दिया जाता है। ये ऐसे नागरिक होते हैं , जिन्हें बिना वारंट
गिरफ्तार या हिरासत में ले लिया जा सकता है। ऐसे कानून को ख़त्म
करने की जगह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने निजी मनोचिकित्सक संघ के
सहयोग से जो विधेयक तैयार किया,
उसका मानवाधिकार कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं। अनुमान है की वर्ष 2020 तक गैर
संक्रामक बिमारियों में सबसे ज्यादा रोगी मनोविकार के ही होंगे। इस समस्या का
सामना भारत कैसे करेगा?आधिकारिक
आंकड़ो के
मुताबिक, भारत की
जनसँख्या का सात फीसदी
मनोविकार रोग से ग्रसित है। इनमे से 90% रोगियों के पास इलाज की
सुविधा नहीं है। दिक्कत सिर्फ इतनी नहीं है, मनोचिकित्सा का आधार Diagnostic and statistical Manual अमेरिका
में विकसित और मानकीकृत हुआ है। यह मनोविकार को वैश्विक चश्मे से देखता है और मनोरोगियों को
अमेरिका में बनी श्रेणियों में बांटता है, जबकि हमारे देश में
गरीबी और कुपोषण की वजह
से से लोग मनोरोगी हो जाते हैं। मनोरोगियों में ऐसे लोगों की संख्या काफी
अधिक है, जिनके
पास अपना घर नहीं है।फिर इनकी
देखभाल किसी भी व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमजोर बना देता है। परिवार ऐसे लोगों को
अक्सर छोड़ देतें हैं।
यह अच्छी
बात है की सरकार मनोरोगियों के लिए कुछ करना चाहती है, पर इसके लिए उसने
मनोचिकित्सकों की ही
बात सुनी है।पूरी दुनिया में मनोचिकित्सा पर वैज्ञानिक और नैतिक आधार पर
सवाल उठाये जाते हैं। कैसा होता अगर मनोविकार से उबरने वाले लोगों को इसमें शामिल
किया जाता ? चिकित्सक
सिर्फ दवाई का रास्ता जानते हैं। क्या आप अपने दातों की सुरक्षा की जिम्मेदारी
सिर्फ चिकित्सक को सौंप सकते हैं?
तो मन की सुरक्षा मनोचिकित्सकों के हाथों में क्यों ?
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