Tuesday, 23 October 2012

माँ का विसर्जन

माँ का विसर्जन
                     -भागवत शरण झा 'अनिमेष'
माँ फिर घर से आई है
लाई है साथ में स्मृतियों की सौगात
टूटते - बिखरते सम्बन्धों के अवशेष
उम्र की ढलान पर हांफती थकान
विभाजन की पीड़ा
और 'फुक्का मुट्ठी ' होने का दर्द

माँ के साथ नहीं आई है वह माँ
जो शरद पूनम की रात 
चूल्हा पूजकर पकाती थी खीर
गृहिणी के गौरव से दिपता था मुख-कुमुद
मातृत्व के उजास से
दमकता था पूरा परिवार।

वह माँ भी नहीं आई है इस माँ के साथ 
नवरात्र की हर रात 
गुहराती थी देवी को 
करती थी टोटके
हमारे सुमंगल के लिए 
अथवा वह जो दिवाली के भिनसार 
सूप पीट-पीटकर 
हंकाती थी दलिद्दर 
और न्योतती  थी लक्ष्मी।

माँ के लिए वे दिन हो गए अतीत के गीत 
जब गणेश - चौथ के दिन 
जुटता था पूरा परिवार 
हुलसकर हम सब दिखाते थे उगते चाँद को 
छछिया - भर दही 
बिखरे होते थे कदली - पात पर 
पान, फूल, दूध, धान .... 

'जुड़ - शीतल' के दिन 
हम सबको जुड़ानेवाली 
दादी की तरह 
माँ भी झेल रही है
साँझा चूल्हा के टूटने की त्रासदी।

बार-बार आएगी माँ
पर स्मृतियों में रची-बसी वह माँ 
फिर कभी लौटेगी ?










भागवत शरण झा 'अनिमेष'
वरिष्ठ कर-सहायक 
आयकर विभाग, पटना  बिहार।



कविता : माँ का विसर्जन 
संकलित : अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले 
संपादक : नन्द किशोर नवल 
प्रकाशक : सारांश प्रकाशन , दिल्ली 


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