Monday, 5 November 2012

डर 
  भागवत शरण झा 'अनिमेष'
सुना है 
इस शहर में भी है 
डर 

डर घूमता है सडकों पर 
रूकता है चौराहों पर 
रात में फिजाओं में 
तैरता है 

डर के हाथ-पाँव नहीं होते 
नहीं होते नख-शिख 
लेकिन जहाँ - तहाँ दिख जाते हैं 
उसके पाँव के निशान 

हम खोजते हैं डर को 
अपनी आशंकाओं के अनुरूप 
मगर वह धूर्त 
हमारे चेहरे पर होता है 
आँखों की पुतलियों में नाचता है
ह्रदय में हँसता है 
जेहन में रेंगता है 

बाघ की आँखों में देखो 
वहां भी गोल-गोल घूमकर 
छल्ले-सा नाचता है डर 
यह सारा शहर डर  का जबड़ा ही है 
जिसके अन्दर हैं हम 
क्या पता कब खा जाए ?
हर तरफ बज रही है 
डर की सिंफनी 
पहले ईश्वर के हवाले था 
अब डॉ के हवाले है शहर 

मासूम गिलहरी पूछती है 
अमलतास से- क्या होता है डर ?
तभी लहलहा उठती है डर की फसल 
बसंत लहूलुहान हो जाता है 

जो कहते हैं की नहीं डरते 
झूठ बोलते हैं 
जबकि झूठ भी है दो अक्षरों का डर 
वैसे ही है जैसे मृत्यु है 
ढाई अक्षरों का डर 
जीवन है तीन अक्षरों का डर 

हमें करना होगा  युद्ध
डर के विरूद्ध 
खोजना होगा डर के अंत का उपाय 
अब तक की पीढियाँ 
डरी हुई पीढियाँ ही मानी जाएँगी 

अब समय आ गया है 
की डर के पर्यायवाची शब्दों की 
कर लें शीघ्रता से शिनाख्त 
घेरकर मार डालें डर को 
रोक दें डर का पुनर्जन्म 
कि कहीं भी दिखे नहीं डर 
नवपूंजीवाद-सा विराट 
साँप-जैसा सुन्दर 

जब नहीं होगा डर 
तब खेलेंगे धुल में बच्चे 
हँसेगा किसान 
मुण्डेर पर आएगी गोरैया 
और लिखेगा कवि 
मुक्तिप्रसंग की एक और कविता 

***   ***   ***

भागवत शरण झा 'अनिमेष'वरिष्ठ कर-सहायक आयकर विभाग, पटना  बिहार।



कविता : माँ का विसर्जन 
संकलित : अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले 
संपादक : नन्द किशोर नवल 
प्रकाशक : सारांश प्रकाशन दिल्ली 
 

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