अथ चित्रकथा....
भागवत शरण झा अनिमेष
आज मैं ने कुछ विचित्र देखा
चित्रकार को तूलिका से ऱचते चित्र देखा
इस रेखाँकन में
पँडिज्जी के पुत्र-कलत्र
लगा रहे थे झाड़ू
मजबूरियों के ठेले ठेल रहे थे
राणा, राजा और ठाकुरों के वंशज
सारे सवर्ण कर रहे थे बूट-पालिश
बिना नालिस
इस चित्र में महारानी
भर रही थी किसी महादलित के घर में पानी
आज मैनें बाइसवीं सदी के भारत को
मित्र सचित्र देखा
वैसे भी मुझे काली जीभवाला ब्राह्मण कहा जाता है
मेरी रसना से निकली हर बात का गूढ़ार्थ
प्राय: रंग लाता है
ठीक वैसा हीं अघटित घट जाता है
कवि! तुम क्या करोगे?
इस चित्र को वरोगे?... अथवा नौटंकी की शैली में
गाओगे-
कुरसी! कुरसी! पुकारूँ सदन में, प्यारी
कूरसी बसी मेरे मन में....!
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