Sunday, 21 October 2012

मैं चाँद भी छू सकता हूँ


छूने को तो मैं चाँद भी छू सकता हूँ
पर नौकर हैं न उसके लिये (अमीर आदमी)
पर कोई कहे तो सही (पिछ्लग्गू आदमी)
पर मौका तो मिले (आम आदमी)
पर कैसे ? (वैज्ञानिक)
पर मैं तो कई बार हो के आया हूँ (भौकाली आदमी)
पर दूरी बहुत है (कामचोर आदमी)
पर जरूरत क्या है (शोधार्थी)
पर वो मेरी पहुँच से दूर है (यथार्थवादी)
पर मेरा काम यह देखना है (सरकारी आदमी)
पर और भी बहुत हैं पर*
अपनी ढपली अपना राग........... (स्पैरो)
*पर = परन्तु


Gaurav Kumar Rai
Post doctoral fellow at बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी 

Sunday, 14 October 2012

manmaafik: ताला (Tala by Sanjay Shandilya)

manmaafik: ताला (Tala by Sanjay Shandilya): कितना परेशान करता है यह ताला  जब बन्द करो बन्द नहीं होगा खोलो हड़बड़ी में खुलेगा नहीं पसीना छुड़ा देगा सबके सामने एकद...

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manmaafik: मन : एक परदा (Man : Ek Parada by Bhagavat Sharan J...: मन  लम्बे अर्से से टँगा एक परदा है जिस पर पड़ गई है धूल हो चुका है धीरे-धीरे फटा-पुराना खो चुका है सहज चटख रंग थका-ह...

Friday, 12 October 2012


आग जलनी चाहिए
- दुष्यन्त कुमार (Dushyant Kumar)

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

Indian Sayari , SMS and Sayari: Judai Ka Ek Lafz

Indian Sayari , SMS and Sayari: Judai Ka Ek Lafz: Judai Ka Ek Lafz unse judai ka ek lafz mujhe shool sa lagta hai; Unke bina sab kuch mujhe dhool sa lagta hai; Kaise batayen unhe ki kitni...

Wednesday, 10 October 2012

मनोवाणी (Manovani )


मनोवाणी (Manovani )
एक महत्वपूर्ण आलेख दिनांक 10.10.2012 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रतीक्षा शर्मा द्वारा लिखा गया। हिंदुस्तान के मानसिक स्वस्थ्य जगत के लिए महत्वपूर्ण है। मैं उसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। ..........................
                                        
                                 मानसिक स्वास्थ्य  विधेयक के मनोविकार 
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का प्रस्तावित मानसिक विधेयक 2012 मानसिक बीमारियों की वजह से अक्षमता के साथ जी रहे लोगो के लिए एक सदमा है। हालाँकि इस विधेयक की वकालत करने वाले इसे मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बताते हुए अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। लेकिन यह विधेयक मनोचिकितसकों की शक्ति में  वृद्धि कर सकता है की इसके सहारे वे  मनोरोगियों ( उनकी बीमारी की पुष्टि  हो या नहीं) के साथ कुछ भी कर पा सकेंगे।
    मनोविकारों के साथ जीने वाले लम्बे समय से अपने आधारभूत अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। इन अधिकारों में जीने के अधिकार के साथ प्रतिष्ठा, आजादी, निजता, इलाज करने या न करने की स्वतंत्रता आदि  शामिल है। मनोरोगियों को दुनिया के सभी देशों के कानून के तहत खतरनाक और विक्षिप्त करार दिया जाता है। इन्हें आम आदमी के अधिकार  दिए जाते। इन्हें वोट के अधिकर से भी वंचित कर दिया जाता है। ये ऐसे नागरिक होते हैं , जिन्हें बिना वारंट गिरफ्तार या हिरासत में ले लिया जा सकता है। ऐसे कानून को ख़त्म करने की जगह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने निजी मनोचिकित्सक संघ के सहयोग से जो विधेयक तैयार किया, उसका मानवाधिकार कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं। अनुमान है की वर्ष 2020 तक गैर संक्रामक बिमारियों में सबसे ज्यादा रोगी मनोविकार के ही होंगे। इस समस्या का सामना भारत कैसे करेगा?आधिकारिक आंकड़ो  के मुताबिक, भारत की जनसँख्या का सात  फीसदी मनोविकार रोग से ग्रसित है। इनमे से 90% रोगियों के पास  इलाज की सुविधा नहीं है। दिक्कत सिर्फ इतनी नहीं है, मनोचिकित्सा का आधार Diagnostic and statistical  Manual अमेरिका में विकसित और मानकीकृत हुआ है। यह मनोविकार  को वैश्विक चश्मे से देखता है और मनोरोगियों को अमेरिका में बनी श्रेणियों में बांटता है, जबकि हमारे देश में गरीबी और कुपोषण  की वजह से  से लोग मनोरोगी हो जाते हैं। मनोरोगियों में ऐसे लोगों की संख्या काफी अधिक है, जिनके पास अपना घर नहीं है।फिर इनकी देखभाल किसी भी व्यक्ति को आर्थिक रूप से कमजोर बना देता है। परिवार ऐसे लोगों को अक्सर छोड़ देतें हैं।
  यह अच्छी बात है की सरकार मनोरोगियों के लिए कुछ करना चाहती है, पर इसके लिए उसने मनोचिकित्सकों की ही बात सुनी है।पूरी दुनिया में मनोचिकित्सा पर वैज्ञानिक  और नैतिक आधार पर सवाल उठाये जाते हैं। कैसा होता अगर मनोविकार से उबरने वाले लोगों को इसमें शामिल किया जाता ? चिकित्सक सिर्फ दवाई का रास्ता जानते हैं। क्या आप अपने दातों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ चिकित्सक को सौंप सकते हैं? तो मन की सुरक्षा  मनोचिकित्सकों के हाथों में क्यों ?  
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Tuesday, 9 October 2012

काव्य - वाणी (Kavya-Vani)



छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
- गोपालदास "नीरज" (Gopaldas Neeraj)

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है |
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है |

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है |

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है |

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
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