पढ़ो भी गढ़ो भी.... नये एवं सिद्ध-हस्त कवियों एवं विविध विधाओं के सृजकों का भरपूर स्वागत है।
Tuesday, 23 October 2012
Sunday, 21 October 2012
होशवालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है?
होशवालों को खबर क्या
बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क कीजिये फिर समझिये
ज़िन्दगी क्या चीज़ है
उनसे नज़रें क्या मिलीं
रौशन फिजाएं हो गयीं
आज जाना प्यार की
जादूगरी क्या चीज़ है
बिखरी जुल्फों ने सिखाई
मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया
मैकशी क्या चीज़ है?
हम लबों से कह ना पाए,
उनसे हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं
ये ख़ामोशी क्या चीज़ है?
जगजीत:
एक ऐसी पुरकशिश आवाज जिसे सुनने के बाद ऐसा
लगता है जैसे कही अनंत ब्रह्माण्ड में कोई स्वर उठा है अभी और धीरे - धीरे कही
खोता जा रहा है। जिसे हम महसूस तो कर सकते हैं मगर ठहरने की प्रार्थना भी कैसे
करें क्योंकि तब तक तो यह खो ही जायेगी । यह आवाज तो अनंत में खो ही गई मगर कुछ
विरासत है उसी से काम चलाना है।इस आवाज को हम सभी का सलाम!
मैं चाँद भी छू सकता हूँ
छूने को तो मैं चाँद भी छू सकता हूँ
पर नौकर हैं न उसके लिये (अमीर आदमी)
पर कोई कहे तो सही (पिछ्लग्गू आदमी)
पर मौका तो मिले (आम आदमी)
पर कैसे ? (वैज्ञानिक)
पर मैं तो कई बार हो के आया हूँ (भौकाली आदमी)
पर दूरी बहुत है (कामचोर आदमी)
पर जरूरत क्या है (शोधार्थी)
पर वो मेरी पहुँच से दूर है (यथार्थवादी)
पर मेरा काम यह देखना है (सरकारी आदमी)
पर और भी बहुत हैं पर*
अपनी ढपली अपना राग........... (स्पैरो)
*पर = परन्तु
पर नौकर हैं न उसके लिये (अमीर आदमी)
पर कोई कहे तो सही (पिछ्लग्गू आदमी)
पर मौका तो मिले (आम आदमी)
पर कैसे ? (वैज्ञानिक)
पर मैं तो कई बार हो के आया हूँ (भौकाली आदमी)
पर दूरी बहुत है (कामचोर आदमी)
पर जरूरत क्या है (शोधार्थी)
पर वो मेरी पहुँच से दूर है (यथार्थवादी)
पर मेरा काम यह देखना है (सरकारी आदमी)
पर और भी बहुत हैं पर*
अपनी ढपली अपना राग........... (स्पैरो)
*पर = परन्तु
Gaurav Kumar Rai
Post doctoral fellow at बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी Sunday, 14 October 2012
manmaafik: ताला (Tala by Sanjay Shandilya)
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Friday, 12 October 2012
आग जलनी चाहिए
- दुष्यन्त कुमार (Dushyant Kumar)
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
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